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Triplanetary by E. E. Smith

The present Science fiction story 'Triplanetary' by the famous writer E. E. Smith was first published in the year 1934. This novel was first serialized in a magazine called Amazing Stories. It is a space opera.

Triumphs of Invention and Discovery in Art and Science by J. Hamilton Fyfe

It is not difficult to account for the pre-eminence, generally assigned to the victories of war over the victories of peace in popular history. The noise and ostentation which attend the former, the air of romance which surrounds them,—lay firm hold of the imagination, while the directness and rapidity with which, in such transactions, the effect follows the cause, invest them with a peculiar charm for simple and superficial observers.

True Tales of the Weird: a record of personal experiences of the supernatural by Sidney Dickinson

"True Tales of the Weird - A Record of Personal Experiences of the Supernatural" contains accounts of personal experiences of 'ghosts' and the supernatural from the early twentieth century. Although the author didn't personally believe in ghosts, he wanted to publish this volume for future scientific interest. This volume is highly recommended for those with an interest in the supernatural.

Trusteeship  by M. K. GANDHI

It is perfectly possible for an individual to adopt this way of life without having to wait for others to do so. And if an individual can observe a certain rule of conduct, it follows that a group of individuals can do likewise. It is necessary for me to emphasize the fact that no one need wait for anyone else in order to adopt a right course. Men generally hesitate to make a beginning if they feel that the objective cannot be had in its entirety. Such an attitude of mind is in reality a bar to progress. —FROM THE BOOK

TRUTH IS GOD by M. K. GANDHI

God and therefore religion are fundamental necessities for normal healthy life to the individual as well as to nations. Here in this book the reader will find Gandhiji speaking from his heart on various occasions in the course of thirty years of the maturest period of his life. What a modern man who did very great things thought on the subject of God and religion cannot fail to be instructive to educated men and women in these difficult days.

Tukdon Mein Nahin, Poora Asmaan Chahiye by Neelima Singh

उड़ने की चाह में पंख तो मिले पर आकाश नहीं मिला एक टुकड़ा आसमान का मेरे आँगन से दिखता पिता ने कहा तू जितनी चाहे उड़ यही तेरा आकाश है मैंने देखा उनकी तरफ मेरा मौन मुखर हो बोला मुझे टुकड़ों में नहीं पूरा आसमान चाहिए उड़ने को सारा संसार चाहिए । - इसी पुस्तक मै

Tukdon Tukdon Mein Aurat by Mamta Mahrotra

‘‘हाँ! क्या मामला है? न्याय की प्रक्रिया शुरू की जाए।’’ ‘‘जी, ये इस शहर के एक युवक के साथ शहर की सीमा पार कर रही थी। यह जुर्म किया है इसने।’’ ‘‘नहीं! मैंने जुर्म नहीं किया है। इस युवक ने मेरे आगे पेशकश की थी कि यह मुझे गाँव छोड़ आएगा। वहाँ मेरे बच्चे भूखे हैं। मैं उनके लिए रोटी लेकर जा रही थी।’’ ‘‘पाप! अब तो तुमने महापाप किया है। शहर की रोटी गाँव लेकर जा रही थी। तुमको दंड मिलेगा और युवक की गलती भी नहीं है। जरूर एक स्त्री होकर तुमने उसको पथभ्रमित किया होगा। कोई पुरुष इतना साहसिक कदम उठा ही नहीं सकता है, अगर स्त्री उसको न उकसाए।’’ —इसी संग्रह से प्रस्तुत संग्रह की अधिकांश कहानियाँ नारी के अस्तित्व की लड़ाई को दरशानेवाली हैं। कैसे एक महिला समाज में हर स्तर पर प्रताड़ना और अवहेलना झेलती है। उसका किस प्रकार शोषण होता है। नारी के जीवन जीने की जद्दोजहद को लेखिका ने इन कहानियों में बड़ी सूक्ष्मता और सहजता से अभिव्यक्‍त किया है। समस्त कहानियाँ कहीं-न-कहीं हमारे अंदर की दोयम सोच एवं खोखलेपन को बखूबी दरशाती हैं। पठनीयता से भरपूर, मन को उद्वेलित करनेवाली कहानियाँ।

Tulsi Dohawali by Raghav Raghu

हिंदुओं के पवित्र ग्रंथ ‘रामचरितमानस’ के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास को उत्तर भारत के घर-घर में अकूत सम्मान प्राप्‍त है। राम की अनन्य भक्‍त‌ि ने उनका पूरा जीवन राममय कर दिया था। हालाँकि उनका आरंभिक जीवन बड़ा कष्‍टपूर्ण बीता, अल्पायु में माता के निधन ने उन्हें अनाथ कर दिया। उन्हें भिक्षाटन करके जीवन-यापन करना पड़ा। धीरे-धीरे वह भगवान् श्रीराम की भक्‍त‌ि की ओर आकृष्‍ट हुए। हनुमानजी की कृपा से उन्हें राम-लक्ष्मण के साक्षात् दर्शन का सौभाग्य प्राप्‍त हुआ। इसके बाद उन्होंने ‘रामचरितमानस’ की रचना आरंभ की। ‘रामलला नहछू’, ‘जानकीमंगल’, ‘पार्वती मंगल’, ‘कवितावली’, ‘गीतावली’, ‘विनयपत्रिका’, ‘कृष्‍ण गीतावली’, ‘सतसई दोहावली’, ‘हनुमान बाहुक’ आदि उनके प्रसिद्ध ग्रंथ हैं। यह पुस्तक उन्हीं तुलसी को समर्पित है, जो अपनी रचनाओं द्वारा हमारा मार्गदर्शन करते हैं, हमें सामाजिक व आध्यात्मिक रूप से श्रेष्‍ठ बनने की शिक्षा देते हैं। तुलसी की वाणी, उनकी रचनाएँ मन को छू लेनेवाली हैं; हमें मार्ग दिखानेवाली हैं। इनका संदेश हमारा पाथेय है।

Tulsidas Bhakti Prabandh Ka Naya Utkarsh by Vidya Nivas Misra

तुलसी की रामकथा की रचना एक विचित्र संश्‍लेषण है । एक ओर तो श्रीमद‍्भागवत पुराण की तरह इसमें एक संवाद के भीतर दूसरे संवाद, दूसरे संवाद के भीतर तीसरे संवाद और तीसरे संवाद के भीतर चौथे संवाद को संगुफित किया गया है और दूसरी ओर यह दृश्य-रामलीला के प्रबंध के रूप में गठित की गई है, जिसमें कुछ अंश वाच्य हैं, कुछ अंश प्रत्यक्ष लीलायित होने के लिए हैं । यह प्रबंध काव्य है, जिसमें एक मुख्य रस होता है, एक नायक होता है, मुख्य वस्तु होती है, प्रतिनायक होता है- और अंत में रामचरितमानस में तीनों नहीं हैं । यह पुराण नहीं है, क्योंकि पुराण में कवि सामने नहीं आता है- और यहाँ कवि आदि से अंत तक संबोधित करता रहता है । एक तरह से कवि बड़ी सजगता से सहयात्रा करता रहता है । पुराण में कविकर्म की चेतना भी नहीं रहती-सृष्‍ट‌ि का एक मोहक वितान होता है और पुराने चरितों तथा वंशों के गुणगान होते हैं । पर रामचरितमानस का लक्ष्य सृष्‍ट‌ि का रहस्य समझाना नहीं है, न ही नारायण की नरलीला का मर्म खोलना मात्र है । उनका लक्ष्य अपने जमाने के भीतर के अंधकार को दूर करना है, जिसके कारण उस मंगलमय रूप का साक्षात्कार नहीं हो पाता- आदमी सोच नहीं पाता कि केवल नर के भीतर नारायण नहीं हैं, नारायण के भीतर भी एक नर का मन है नर की पीड़ा है ।

Tum Kab Aaoge Shyava by Suryakant Bali

सूर्यकांत बाली का यह उपन्यास वैदिक प्रेमकथा पर आधारित है। वैदिक काल के किसी कथानक को उपन्यास के माध्यम से पाठकों तक सशक्त और अत्यंत आकर्षक शैली में पहुँचाने वाले श्री बाली हिंदी ही नहीं, संभवतः समस्त भारतीय भाषाओं के प्रथम उपन्यासकार के रूप में हमारे सामने हैं। यह उपन्यास प्रसिद्ध वैदिक ऋषि श्यावाश्व आत्रेय के जीवन पर आधारित है। श्यावाश्व जिस कुल में पैदा हुए थे, उसे हम वैदिक अत्रि कुल के नाम से जानते हैं, और जब-जब भी अत्रि मुनि की बात करते हैं तो हमें उस ऐतिहासिक घटना का स्मरण हो जाता है, जब राम वनगमन के समय अत्रि और अनसूया के आश्रम में गए थे। उसी अत्रि कुल में पैदा हुए श्यावाश्व आत्रेय की प्रसिद्धि इस कारण भी हुई कि वे मन में ही संपूर्ण सृष्टि की उत्पत्ति का कारण मानते थे। श्यावाश्व जिस अत्रि कुल में हुए उसे हम ऐतिहासिक आधार पर त्रेतायुग का और चार से छह हजार वर्ष पूर्व का मानते हैं, जब वैदिक काल अपने शिखर पर था। प्रेम और दार्शनिकता से भरपूर प्रस्तुत कथा ‘तुम कब आओगे श्यावा’ में ऋषि श्यावाश्व की ऐतिहासिक जीवनगाथा के साथ-साथ प्राचीन वैदिक काल के आश्रमों, राजप्रासादों और सामान्य जीवनशैली को बड़े ही सजीव तरीके से पाठकों के समक्ष रख दि गया है।

Tum Yaad Aaoge Leelaram by Prakash Manu

‘तुम याद आओगे लीलाराम’ संग्रह वरिष्ठ कवि-कथाकार प्रकाश मनु की इधर लिखी गई, नई और ताजा कहानियों का संग्रह है। बिल्कुल अलहदा ढंग की कथन-शैली और गहरी मर्म पुकार लिये ये कहानियाँ अपनी अद्भुत किस्सागोई और अनौपचारिक लहजे के कारण अलग पहचान में आती हैं। सच तो यह है कि ‘तुम याद आओगे लीलाराम’ संग्रह प्रकाश मनुजी की कथा-यात्रा में एक सार्थक मोड़ की तरह है, और एक साथ कई विशेषताओं के कारण जाना जाएगा। संग्रह की कहानियाँ जिंदगी में इस कदर गहरे धँसकर अपनी बात कहती हैं कि पाठक चकित हुआ सा, खुद को अपनी तकलीफों, समूची वेदनाओं और आत्मिक द्वंद्वों के साथ इनमें पूरी तरह उपस्थित पाता है। लेखक और पाठक का इतना गहन तादात्म्य हिंदी कहानी के मौजूदा परिदृश्य में एक विरल चीज है। फिर अपने ही ढंग के ?विशिष्ट कथाकार प्रकाश मनुजी की ये कहानियाँ अकसर बतकही के-से अंदाज में अपनी बात कहती हैं। इनमें कविता सरीखी मर्म पुकार है तो आत्मकथा सरीखा निजत्व भी। कहानी और जिंदगी के फासलों को पाटनेवाली ये सादा और पुरअसर कहानियाँ अगर प्रेमचंद और मटियानी सरीखे दिग्गजों की याद दिलाएँ, तो कोई हैरत की बात नहीं। उम्मीद है, प्रकाश मनु की इन कहानियों की ताजगी पाठकों के दिलों में कभी फीकी न पड़नेवाली एक अलग छाप छोड़ेगी। और एक बार पढ़ने के बाद वे इन्हें कभी भूल नहीं पाएँगे।

Tumhare Liye, Bas by Madhup Mohta

इस संकलन में राजनैतिक विमर्श या इतिहास बोध की कविताएँ नहीं हैं; अधिकांश प्रेम कविताएँ हैं, जो एक लंबे अरसे में लिखी गईं। कई कविताएँ एक देश में प्रारंभ हुईं और किसी दूसरे देश में समाप्त हुईं। कई कविताएँ दूरदर्शन पर गाई जा चुकी हैं और कुछ व्यक्तिगत गोष्ठियों में। कुछ नज़्में और ़गज़लें ‘दिल है ऩगमा निगार’ और ‘तुम्हारे प्यार का मौसम’ सी.डी. में संकलित हुई हैं। कुछ कविताएँ मेरे मित्र फेसबुक ग्रुप ‘एप्रिल इज नॉट द क्रूएलेस्ट मंथ’ पर प्रसारित होकर प्रशंसित हो चुकी हैं। मन के भावों को पुस्तक का रूप देना आसान नहीं होता। विशेषकर भारतीय समाज में प्रेम कविताएँ लिखना और प्रकाशित करना एक बहुत बड़ा ़खतरा मोल लेनेवाली बात है। मैं इस बात का कोई जवाब नहीं दूँगा कि ये कविताएँ किसके लिए लिखी गई हैं। जिसके लिए लिखी गई हैं, उसे मालूम है। इसलिए इसका शीर्षक : तुम्हारे लिए, बस।

Tumhari Jay by Ashutosh Shukla

सृष्टिकर्ता की तरह साहित्यकार भी अपने अपने ढंग से अपने देश, उसकी संस्कृति, परंपरा और इतिहास को व्याख्यायित करता है, नई स्थापनाएँ देता है। जैसे गंगा में कई नदियों का पानी, अनेक पर्वतों की मिट्टी और औषधीय तत्त्व मिलकर उसे उर्वरता प्रदान करते हैं, उसी प्रकार साहित्य को भी अनेक विधाएँ समृद्ध करती हैं। आशुतोष शुक्ल प्रयोगधर्मी लेखक हैं, जिन्होंने एक नई ‘संभाषी’ विधा से साहित्य को समृद्ध किया है। उनके शब्द लगातार पाठकों से बतियाते रहते हैं। सहजै सहज समाना की तरह वह अपनी शैली में सिद्धहस्त हैं। कम शब्दों में कही गई उनकी बात पानी की बूँद की तरह फैलती जाती है और फैलकर पूरी नदी बन जाती है। छोटे-छोटे वाक्यों में गुरुत्वाकर्षण सा बल है। उनकी संभाषी विधा साहित्य में नया गवाक्ष खोलती है जहाँ से ‘तुम्हारी जय’ का आख्यान साफ-साफ देखा जा सकता है। ‘तुम्हारी जय’ उन छोटी-छोटी बातों की बात करती है जो सदियों से भारतवासियों को गढ़ रही हैं। ‘तुम्हारी जय’ अनुपम और संग्रहणीय कृति है और भारत के इतिहास और समाज को देखने का नया दर्पण भी।

Tuzuk-i-Jahangiri: or Memoirs of Jahangir by Henry Beveridge, Alexander Roger, and Nuru-d-din Jahangir

Tuzuk-i-Jahangiri: or Memoirs of Jahangir' is the autobiography of Mughal Emperor Jahangir. Also referred to as Jahangirnama, this book is written in Persian, and follows the tradition of his great-grandfather Babur, who had written the Baburnama; though Jahangir went a step further and besides the history of his reign, he includes details like his reflections on art, politics, and also information about his family.

Tweet Kahaniyan by Dr. Lata Kadambari Goel

तभी उनमें से एक इतिहास मर्मज्ञ गिद्ध चिल्लाया—इतने नीच नहीं हैं हम, जब सीता मैया का अपहरण कर रावण उन्हें लंका ले जा रहा था, तब हमारे प्रपितामाह जटायुजी ने उनकी रक्षा करने हेतु लहूलुहान होकर अपने प्राणों का परित्याग कर दिया था और ये अखबार वाले? इन नीच लड़कों की तुलना हमसे करते हैं? एक बार फिर समवेत स्वरों में वे चिल्लाने लगे। दूसरा चिल्लाया—हमारी दृष्टि की तारीफ तो सारी दुनिया करती है और एक ये हैं? कह...गुस्से में आकर अपने पंख फड़फड़ाने लगा। तभी उनके बीच से एक जागरूक बूढ़ा गिद्ध उठकर बोला—तुम सबकी बातों में दम है मेरे बच्चो, तुम सभी को अपने हक में जरूर आवाज उठानी चाहिए। माना कि हम नरभक्षी हैं, मांस हमारा प्रिय आहार है पर हम तो मरों को खाते हैं, पर ये? हरामी की औलादें तो जिंदों को ही खा डालना चाहती हैं। —इसी संग्रह से जीवन की अव्यक्त अभिव्यक्ति को व्यक्त करने का प्रयास करती इन छोटी-छोटी ट्वीट कहानियों के माध्यम से लेखिका ने जीवन की छोटी-छोटी, लेकिन महत्त्वपूर्ण समस्याओं को सुलझाने के लिए जिंदगी का ताना-बाना बुनने का प्रयास किया है। इन कहानियों के कथ्य कैसे हैं? फंदे कैसे पड़े हैं? बुनावट कैसी है? कहानियों का भाषा-संयोजन कैसा है? यह देखना अब आपका काम है। वैसे भी चिड़ियों के समान ये कहानियाँ भी चहककर ट्वीट-ट्वीट कर रही हैं। ये छोटी-छोटी कहानियाँ आपको अपने आसपास के परिवेश, अपने संबंधों, अपने मनोभावों का आईना ही लगेंगी।

Twelfth Night; Or, What You Will by William Shakespeare

Twelfth Night, or What You Will is a comedy by William Shakespeare, believed to have been written around 1601–02 as a Twelfth Night's entertainment for the close of the Christmas season.

Twelve Men by Theodore Dreiser

First published in the year 1919, the present book 'Twelve Men' by American novelist and journalist Theodore Dreiser is collection of character sketches, combining the best of biography with the finest of narrative - short and illustrative.

Twelve Years a Slave by Solomon Northup

"Having been born a freeman, and for more than thirty years enjoyed the blessings of liberty in a free State—and having at the end of that time been kidnapped and sold into Slavery, where I remained, until happily rescued in the month of January, 1853, after a bondage of twelve years—it has been suggested that an account of my life and fortunes would not be uninteresting to the public." -an excerpt

Twenty Thousand Leagues under the Sea by Jules Verne

The year 1866 was signalised by a remarkable incident, a mysterious and puzzling phenomenon, which doubtless no one has yet forgotten. Not to mention rumours which agitated the maritime population and excited the public mind, even in the interior of continents, seafaring men were particularly excited. Merchants, common sailors, captains of vessels, skippers, both of Europe and America, naval officers of all countries, and the Governments of several States on the two continents, were deeply interested in the matter.

Twenty Years a Detective in the Wickedest City in the World by Wooldridge

In presenting this work to the public the author has no apologies to make nor favors to ask. It is a simple history of his connection with the Police Department of Chicago, compiled from his own memoranda, the newspapers, and the official records. The matter herein contained differs from those records only in details, as many facts are given in the book which have never been made public. The author has no disposition to malign any one, and names are used only in cases in which the facts are supported by the archives of the Police Department and of the criminal court. In the conscientious discharge of his duties as an officer of the law, the author has in all cases studied the mode of legal procedure. His aim has been solely to protect society and the taxpayer, and to punish the guilty.

Twenty Years After by Alexandre Dumas

Alexandre Dumas's novel 'Twenty Years After' is a sequel to his 'The Three Musketeers' and precedes 'The Vicomte de Bragelonne'. Through the words of the main characters, particularly Athos, Dumas comes out on the side of the monarchy in general, or at least the text often praises the idea of benevolent royalty. His musketeers are valiant and just in their efforts to protect young Louis XIV and the doomed Charles I from their attackers.

Twenty-six and One, and Other Stories by Maksim Gorky

Russian literature, which for half a century has abounded in happy surprises, has again made manifest its wonderful power of innovation. A tramp, Maxime Gorky, lacking in all systematic training, has suddenly forced his way into its sacred domain, and brought thither the fresh spontaneity of his thoughts and character. Nothing as individual or as new has been produced since the first novels of Tolstoy. His work owes nothing to its predecessors; it stands apart and alone. It, therefore, obtains more than an artistic success, it causes a real revolution.

Twice Told Tales by Nathaniel Hawthorne

First published in the year 1837, the present book 'Twice Told Tales' by famous English writer Nathaniel Hawthorne is a collection of short stories. This collection consists of his forty short stories.

Twilight Sleep by Edith Wharton

Moving effortlessly between satire and sympathy, Edith Wharton paints a gleaming portrait of 1920s New York society. At its centre is Pauline Manford, indefatigable hostess and do-gooder, who rules her family with ruthless charm, Dexter the generous lawyer who is her second husband, Arthur her ramshackle first husband, Nona, her gentle daughter, and son Jim, married to the exqisite Lita. When the preposterous Marchesa arrives on the scene, trailing debts and problems, Pauline strives with increasing desperation to keep her family together, too busy to recognise the threatening truth until it explodes in a tragi-comic catastrophe.

Twixt Land & Sea: Tales by Joseph Conrad

Ever since the sun rose I had been looking ahead. The ship glided gently in smooth water. After a sixty days’ passage I was anxious to make my landfall, a fertile and beautiful island of the tropics. The more enthusiastic of its inhabitants delight in describing it as the “Pearl of the Ocean.” Well, let us call it the “Pearl.” It’s a good name. A pearl distilling much sweetness upon the world.

Two College Friends by Fred. W. Loring

Indignation at my dedicating this book to you will be useless, since I am at present three thousand miles out of your reach. Moreover, this dedication is not intended as a public monument to our friendship;—I know too much for that. If that were the case, we should manage to quarrel even at this distance, I am quite confident, before the proof-sheets had left the press. But I can dedicate it to you alone of all my college friends, because you and I were brought so especially into the atmosphere of the man who inspired me to undertake it,—the man to whom, under God, I shall owe most of what grace and culture I may ever acquire.

Two Festivals by Eliza Lee Cabot Follen

"How beautiful!" said Frank and Harry. "Suppose, Mother," said Harry, "it should rain, and hail, and snow to-morrow, for it looks like it now, and then you know we cannot go into the woods and gather flowers; and all our plans will be spoiled." "Why, then, my dear, we must enjoy May morning as the great poet did, after he lost his sight, with our mind's eye; and you must bear your disappointment patiently." "Easier said than done, Mother," said Harry. "Why, only think of all our preparations, and the beautiful wreath you made for Lizzy Evans, who is to be queen of the May, and how pretty she would look in it, and then think of the dinner in the woods, we all sitting round in a circle, and she and the king of the May in the midst of us, and Ned Brown playing on his flageolet; and then you know we are all to walk home in procession, and have a dance at his mother's after tea." "You will not lose your dance, Harry," said his mother, "if it should hail, and rain, and snow; but, on the contrary, enjoy it all the more, for then you will riot be fatigued by a long walk; and Lizzy can wear the wreath at any rate."